Shaily Bhagwat

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"पाठशाला"

"पाठशाला"

जीवनरूपी ये "पाठशाला"
भी सच कितनी अजीब है,
बिन किताबों के ही अनुभवों
से भरी डिग्रियों की भीड़ है।
किसी कक्ष में उज्जवल
भविष्य की उम्मीद है,
तो कही नाकामबियों
की पुरानी तस्वीर है।
कभी मस्ती भरे चंद वार
दोस्तों के साथ बिताते है,
कभी अनुशासन के डंडे
का प्रहार नहीं सह पाते है।
निश्छल मुस्कानों से मैदानों
में ऊंची छलांगें भरे है,
रिश्तों की गर्मी में तप कर
वीरान बागों को तकते है
वर्ष, महीने,दिन के साथ
पल पल बंटा हुआ है,
हर गुजरते क्षण में ज्ञान
का मोती छुपा हुआ है।
उम्र का हर पड़ाव योग्य
शिक्षक सा नज़र आता है,
स्वभाव, व्यवहार,आचरण के
गूढ़ रहस्य हमें समझाता है।
रंगबिरेंगे सपने कल्पनाओं
की चॉक से उकेरे जाते है,
मज़बूरी के डस्टर से टकरा
धुंधले से पड़ रह जाते है।
राष्ट्रीय दिवस उत्साह से
भर सजधज कर मनाते है,
वीर बन पर देशभक्ति का
वो जज्बा कहाँ ला पाते है।
कामयाबी हासिल करने
का दबाब ताउम्र सहते है,
उच्च प्रदर्शन में फिसले तो
हीन भावना से ग्रसित रहते है।
स्वार्थ से अंकों के परिणाम
प्रतिदिन बनते बिगड़ते है,
पास हो या फेल  परिणाम

स्वीकार कर बढ़ते रहते है।

 # प्रतियोगिता हेतु 

स्वरचित एवं मौलिक

शैली भागवत "आस" ✍️



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6 Comments

Raziya bano

08-Jun-2022 07:53 AM

Bahut khub

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शानदार रचना

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Swati chourasia

08-Jun-2022 06:36 AM

बहुत खूब 👌👌

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